दाद देनी पड़ेगी हमारे लोक निर्माण विभाग और जिम्मेदार हुक्मरानों की। हमारे यहाँ सड़कें जनता के चलने के लिए नहीं, बल्कि बारिश के पानी में 'स्विमिंग पूल' और 'एडवेंचर पार्क' का अहसास कराने के लिए बनाई जाती हैं।
लाखों-करोड़ों रुपए का बजट कागजों पर बहता है और सड़क पर जरा सा पानी क्या गिरा, सड़क खुद बहकर गायब हो जाती है। जब वीआईपी साहब का दौरा होता है, तो रातों-रात ऐसी 'मखमली' सड़क बिछाई जाती है कि लगता है विकास सीधे स्वर्ग से उतर आया है। लेकिन जैसे ही साहब का काफिला गुजरा और बादलों ने जरा सी मेहरबानी की, सड़क की असली तस्वीर सामने आ जाती है।
अब देवरी की जनता समझ नहीं पा रही है कि वो सड़क पर चल रही है या गड्ढों के बीच थोड़ी सी बची हुई जमीन तलाश रही है! लगता है पीडब्ल्यूडी विभाग ने ठेकेदारों को सड़क बनाने का नहीं, बल्कि 'गड्ढा बनाओ, बजट पचाओ' योजना का ठेका दे रखा है।